Wednesday, 5 October 2016

वर्ण-विचार वर्णमाला

वर्णमाला
परिभाषा-हिन्दी भाषा में प्रयुक्त सबसे छोटी ध्वनि वर्ण कहलाती है। जैसे-अक्ख् आदि।
वर्णमाला
वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिन्दी वर्णमाला के दो भेद किए गए हैं-
1. 
स्वर
2. 
व्यंजन
स्वर
जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता हो और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक हों वे स्वर कहलाते है। ये संख्या में ग्यारह हैं -
औ।

उच्चारण के समय की दृष्टि से स्वर के तीन भेद किए गए हैं-
1. 
ह्रस्व स्वर।
2. 
दीर्घ स्वर।
3. 
प्लुत स्वर।
1. ह्रस्व स्वर:- जिन स्वरों के उच्चारण में कम-से-कम समय लगता हैं उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं। ये चार हैं- अऋ। इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं।
2. दीर्घ स्वर:- जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगता है उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। ये हिन्दी में सात हैं- आऔ।
विशेष- दीर्घ स्वरों को ह्रस्व स्वरों का दीर्घ रूप नहीं समझना चाहिए। यहाँ दीर्घ शब्द का प्रयोग उच्चारण में लगने वाले समय को आधार मानकर किया गया है।
3. प्लुत स्वर:- जिन स्वरों के उच्चारण में दीर्घ स्वरों से भी अधिक समय लगता है उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। प्रायः इनका प्रयोग दूर से बुलाने में किया जाता है।
मात्राएँ
स्वरों के बदले हुए स्वरूप को मात्रा कहते हैं स्वरों की मात्राएँ निम्नलिखित हैं-
स्वर मात्राएँ शब्द
 × कम
आ ा काम
इ ि किसलय
ई ी खीर
उ ु गुलाब
ऊ ू भूल
ऋ ृ तृण
ए े केश
ऐ ै है
ओ ो चोर
औ ौ चौखट
अ वर्ण (स्वर) की कोई मात्रा नहीं होती। व्यंजनों का अपना स्वरूप निम्नलिखित हैं-
क् च् छ् ज् झ् त् थ् ध् आदि।
अ लगने पर व्यंजनों के नीचे का (हल) चिह्न हट जाता है। तब ये इस प्रकार लिखे जाते हैं-
क च छ ज झ त थ ध आदि।
व्यंजन
जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। अर्थात व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते। ये संख्या में 33 हैं। इसके निम्नलिखित तीन भेद हैं-
1. 
स्पर्श
2. 
अंतःस्थ
3. 
ऊष्म
1. स्पर्श:- इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं। हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है जैसे-
कवर्ग- क् ख् ग् घ् ड़्
चवर्ग- च् छ् ज् झ् ञ्
टवर्ग- ट् ठ् ड् ढ् ण् (ड़् ढ़्)
तवर्ग- त् थ् द् ध् न्
पवर्ग- प् फ् ब् भ् म्
2. अंतःस्थ:- ये निम्नलिखित चार हैं-
य् र् ल् व्
3. ऊष्म
ये निम्नलिखित चार हैं -
श् ष् स् ह्

वैसे तो जहाँ भी दो अथवा दो से अधिक व्यंजन मिल जाते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैंकिन्तु देवनागरी लिपि में संयोग के बाद रूप-परिवर्तन हो जाने के कारण इन तीन को गिनाया गया है। ये दो-दो व्यंजनों से मिलकर बने हैं। जैसे-क्ष=क्+ष अक्षरज्ञ=ज्+ञ ज्ञानत्र=त्+र नक्षत्र कुछ लोग क्ष् त्र् और ज्ञ् को भी हिन्दी वर्णमाला में गिनते हैंपर ये संयुक्त व्यंजन हैं। अतः इन्हें वर्णमाला में गिनना उचित प्रतीत नहीं होता।
अनुस्वार
इसका प्रयोग पंचम वर्ण के स्थान पर होता है। इसका चिन्ह (ं) है। जैसे- सम्भव=संभवसञ्जय=संजयगड़्गा=गंगा।
विसर्ग
इसका उच्चारण ह् के समान होता है। इसका चिह्न (:) है। जैसे-अतःप्रातः।
चंद्रबिंदु
जब किसी स्वर का उच्चारण नासिका और मुख दोनों से किया जाता है तब उसके ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगा दिया जाता है।
यह अनुनासिक कहलाता है। जैसे-हँसनाआँख।

हिन्दी वर्णमाला में 11 स्वर तथा 33 व्यंजन गिनाए जाते हैंपरन्तु
इनमें ड़्ढ़् अं तथा अः जोड़ने पर हिन्दी के वर्णों की कुल संख्या 48 हो जाती है।
हलंत
जब कभी व्यंजन का प्रयोग स्वर से रहित किया जाता है तब उसके नीचे एक तिरछी रेखा (्) लगा दी जाती है। यह रेखा हल कहलाती है। हलयुक्त व्यंजन हलंत वर्ण कहलाता है। जैसे-विद् या।
वर्णों के उच्चारण-स्थान
मुख के जिस भाग से जिस वर्ण का उच्चारण होता है उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते हैं।
उच्चारण स्थान तालिका
क्रम
वर्ण
उच्चारण
श्रेणी
1.
अ आ क् ख् ग् घ् ड़् ह्
विसर्ग कंठ और जीभ का निचला भाग
कंठस्थ
2.
इ ई च् छ् ज् झ् ञ् य् श
तालु और जीभ
तालव्य
3.
ऋ ट् ठ् ड् ढ् ण् ड़् ढ़् र् ष्
मूर्धा और जीभ
मूर्धन्य
4.
त् थ् द् ध् न् ल् स्
दाँत और जीभ
दंत्य
5.
उ ऊ प् फ् ब् भ् म
दोनों होंठ
ओष्ठ्य
6.
ए ऐ
कंठ तालु और जीभ
कंठतालव्य
7.
ओ औ
दाँत जीभ और होंठ
कंठोष्ठ्य
8.
व्
दाँत जीभ और होंठ
दंतोष्
~

भाषा, व्याकरण और बोली

परिभाषा- भाषा अभिव्यक्ति का एक ऐसा समर्थ साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार जाना सकता है।
संसार में अनेक भाषाएँ हैं। जैसे-हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजीबँगला,गुजराती,पंजाबी,उर्दूतेलुगुमलयालमकन्नड़फ्रैंचचीनीजर्मन इत्यादि।

भाषा के प्रकार- भाषा दो प्रकार की होती है-
1. 
मौखिक भाषा।
2. 
लिखित भाषा।
आमने-सामने बैठे व्यक्ति परस्पर बातचीत करते हैं अथवा कोई व्यक्ति भाषण आदि द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तो उसे भाषा का मौखिक रूप कहते हैं।
जब व्यक्ति किसी दूर बैठे व्यक्ति को पत्र द्वारा अथवा पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में लेख द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तब उसे भाषा का लिखित रूप कहते हैं।
व्याकरण
मनुष्य मौखिक एवं लिखित भाषा में अपने विचार प्रकट कर सकता है और करता रहा है किन्तु इससे भाषा का कोई निश्चित एवं शुद्ध स्वरूप स्थिर नहीं हो सकता। भाषा के शुद्ध और स्थायी रूप को निश्चित करने के लिए नियमबद्ध योजना की आवश्यकता होती है और उस नियमबद्ध योजना को हम व्याकरण कहते हैं।

परिभाषा- व्याकरण वह शास्त्र है जिसके द्वारा किसी भी भाषा के शब्दों और वाक्यों के शुद्ध स्वरूपों एवं शुद्ध प्रयोगों का विशद ज्ञान कराया जाता है।
भाषा और व्याकरण का संबंध- कोई भी मनुष्य शुद्ध भाषा का पूर्ण ज्ञान व्याकरण के बिना प्राप्त नहीं कर सकता। अतः भाषा और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध हैं वह भाषा में उच्चारणशब्द-प्रयोगवाक्य-गठन तथा अर्थों के प्रयोग के रूप को निश्चित करता है।

व्याकरण के विभाग- व्याकरण के चार अंग निर्धारित किये गये हैं-
1. 
वर्ण-विचार।
2. 
शब्द-विचार।
3. 
पद-विचार।
4. 
वाक्य विचार।
बोली
भाषा का क्षेत्रीय रूप बोली कहलाता है। अर्थात् देश के विभिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है और किसी भी क्षेत्रीय बोली का लिखित रूप में स्थिर साहित्य वहाँ की भाषा कहलाता है।
लिपि
किसी भी भाषा के लिखने की विधि को ‘लिपि’ कहते हैं। हिन्दीनेपाली और संस्कृत भाषा की लिपि का नाम देवनागरी है। अंग्रेजी भाषा की लिपि ‘रोमन’, उर्दू भाषा की लिपि फारसीऔर पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी है।
साहित्य

ज्ञान-राशि का संचित कोश ही साहित्य है। साहित्य ही किसी भी देशजाति और वर्ग को जीवंत रखने का- उसके अतीत रूपों को दर्शाने का एकमात्र साक्ष्य होता है। यह मानव की अनुभूति के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करता है और पाठकों एवं श्रोताओं के हृदय में एक अलौकिक अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति उत्पन्न करता है।

तत्सम शब्द tatsam sabd(sanskrit words),तद्भव शब्द tadbhav sabd(words modifies from samskrit

तत्सम शब्द Tatsam Sabd (Sanskrit Words) ,

तद्भव शब्द Tadbhav Sabd (Words Modifies From Samskrit)


उत्पति(स्त्रोत) के आधार पर शब्द - भेद चार
1. तत्सम - पिता
2. तद्भव - पुत्र
3. देशज - लावारिस
विदेशी
संकर शब्द
यदि हम तत्सम को पिता माने तो तद्भव को पुत्र मान सकते हैं क्योंकि तत्समतद्भव के गुण रूप आदि एक दुसरे से पिता पुत्र कि तरह मिलते है। कुछ अपवाद भी होते है। लेकिन स्वभाविक रूप से यह माना जा सकता है कि दोनों में कुछ ना कुछ एक समान होगा।
उदाहरण
निम्न में से तत्सम तद्भव का सही जोड़ा नहीं है।
1.     उष्ट्र-ऊट
2.     श्रृंगार-सिंगार
3.     चक्षु-आंख
4.     दधि-दही
उत्तर चक्षु - आंख
यहां आप आसानी से देख सकते हैं कि केवल चक्षु-आंख के जोड़े में कोई समानता नहीं है शेष तीनों जोड़े एक दुसरे से मेल रखते है।
इसलिए सही उत्तर है चक्षु-आंख
यहां चक्षु का तद्भव है- चख और आंख का तत्समक है- अक्षि।
तत्सम शब्द:- संस्कृत भाषा के शब्द जिनका हिन्दी भाषा में प्रयोग करने पर रूप परिवर्तित नहीं होता वे तत्सम शब्द कहलाते हैं।
तथ्य:-
जैसे संस्कृत में बिल्कुल वैसे ही हिन्दी में होंगे।
संधी के प्रचलित नियमों में + से पहले व + के बाद आने वाले शब्द तत्सम कहलाते हैं।
संस्कृत के उपसगोें से बने शब्द सत्सम होते हैं।
विसर्ग(:) तथा अनुसार( ं ) मुख्य रूप से तत्सम शब्दों में पाया जाता है।
जैसे - उष्ट्रमहिषचक्रवातवातकिभुशुण्डीचन्द्रश्लाकाशकटहरिद्र।
तद्भव शब्द :- संस्कृत भाषा के शब्द जिनका हिन्दी भाषा में प्रयोग करने पर रूप बदल जाता है उन्हें तद्भव शब्द कहते हैं।
जैसे - ऊँटभैंसचकवाबैंगनबन्दुकचाँदसलाईछकड़ाहल्दी।
तथ्य:-
1. संस्कृत वाले शब्दों से बनावट में मिलते-जुलते सरल शब्द तद्भव होते हैं।
2. हिन्दी के उपसर्गों से बने शब्द तद्भव होते है।
3. हिन्दी कि क्रियाऐं पढ़नालिखनाखाना आदि तद्भव होते हैं।
4. अंकों को शब्दों में लिखने पर एक को छोड़ कर सभी तद्भव होते हैं।
5. अर्धअनुस्वार ( ँ) अर्थात चरम बिन्दु मुख्य रूप से तद्भव शब्दों में पाया जाता है।
जैसे - चाँदहँसना।
अर्द्धतत्सम शब्द :- संस्कृत से वर्तमान स्थाई तद्भव रूप तक पहुंचने के मध्य संस्कृत के टुटे फुटे स्वरूप का जो प्रयोग किया जाता था उसे अर्द्ध तत्सम कहा जाता है।
जैसे -अगिन या अगि
यह अग्नि(तत्सम) व आग(तद्भव) के मध्य का स्वरूप है।
देशज शब्द :- वे शब्द जिनकी उत्पत्ति के स्त्रोत अज्ञात होते हैं। उन्हें देशज शब्द कहते हैं।
संस्कृतेतर(संस्कृत से अन्य) भारतीय भाषाओं के शब्द देशज होते हैं।
क्षेत्रीय बोलियों के शब्द तथा मनघड़ंत शब्द भी देशज होते हैं।
ध्वनि आदि के अनुकरण पर रचित क्रियाएं जिन्हें अनुक्रणात्मक क्रियाएं भी कहते हैं देशज कहलाती हैं।
जैसे - लड़काखिड़कीलोटाढ़म-ढ़मछपाक-छपाकभौंकना।
विदेशी शब्द
अरबीफारसीअंग्रजी या अन्य किसी भी दुसरे देश की भाषा के शब्द जिनका हिन्दी भाषा में प्रयोग कर लिया जाता है उन्हें विदेशी शब्द कहते हैं।
जैसे -इरादाइशाराहलवाईदीदारचश्माडॉक्टरहॉस्पीटलइलाजबम।
संकर शब्द
किन्ही दो भाषाओं के शब्दों को मिलाकर जिन नये शब्दों कि रचना हुई है।उन्हें संकर शब्द कहा जाता है।
जैसे - डबलरोटी(अंग्रेजी + हिन्दी)नेकचलन(फारसी + हिन्दी)टिकटघर(अंग्रेजी + हिन्दी)।
परिवर्त के आधार पर शब्द
दो भेद
1.     विकारी
2.     अविकारी (अव्यय)
विकारी :- वे शब्द जिनमें लिंग वचन कारक आदि के कारण परिवर्तन होता उन्हें विकारी शब्द कहते हैं
इसके चार भेद हैं-
1. संज्ञा
2. सर्वनाम
3. विशेषण
4. क्रिया
अविकारी :- वे शब्द जिनमें लिंग वचन कारक आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता उन्हें अव्यय या अविकारी शब्द कहते हैं इसके भी मुख्य रूप से चार भेद हैं-
1. क्रिया विशेषण
2. संबंध बोधक
3. समुच्चय बोधक
4. विस्मयादि बोधक


Saturday, 6 February 2016

hindi varnmala

Hindi Varnmal There are Total Swar and Vyanjan In Below.